आगरा

खास : माह-ए-रमजान रहमत व बरकत का महीना है

रमजान का महीना बेहद पाक व रहमत वाला महीना है। रोजदारो को अपने नफ्स के साथ-साथ आंख, हाथ, दिल व जुबान से कुछ भी बुरा करने से परहेज करना चाहिए।

इस्लामी कलैन्डर के मुताबिक अरबी माह का नौवा महीना रमजानुल मुबारक का महीना होता है। यह रहमत व बरकत वाला महीना है। इस माह में रब की जानिब से मुकदस किताब (पवित्र ग्रन्थ) कुरान नाजिल किया गया। रमजान के महीने में अल्लाह के रसूल के फरमान के मुताबिक जन्नत के दरवाजे खोल दिये जाते है और जहन्नुम के दरवाजे बन्द कर दिये जाते है। इसके साथ ही इस माहे मुबारक की बरकत से हर फर्ज इबादतो के बदले सौ गुना नेकियां नामें आमाल में लिख दी जाती है। रोजा केवल भुखे प्यासे रहने नाम नही है बल्कि इस माह मुबारक में अपने नफ्स को हर बुराई से रोकते हुए नेक कामो को किये जाने नाम रोजा है रमजान महीने का रोजा हर बालिग मोमिन मुस्लमान पर फर्ज है। रमजान का महीना बेहद पाक व रहमत वाला महीना है। रोजदारो को अपने नफ्स के साथ-साथ आंख, हाथ, दिल व जुबान से कुछ भी बुरा करने से परहेज करना चाहिए। रमजान के कुरान का महीना कहा जाता है। रमजान महीने की शुरूआत होते ही यानि चांद रात से ही नमाजे एशा के बाद विशेष नमाज बीस रकाअत की नमाजे तरावीह अदा की जाती है। अल्लाह इस महीने में रहमतो की बारिश करता है। कुरान में आया है कि ए ईमान वालो तुम पर रोजा फर्ज किया गया है। ताकि तुम परहेजगार बनों, रमजानुल मुबारक को अल्लाह का महीना भी कहा जाता है। इस महीने में पूरे तीस दिनों तक हाफिज कुरान पढते व लोग सुनते है। जिसे नमाजे तरावीह कहा जाता है रमजानुल मुबारक को तीन अशरा (भागो) में बांटा गया रमजान का पहला अशरा एक से दस रमजान का है इसमें रहमतो की बारिश होती है। ग्यारह से बीस रमजान तक जहन्नुम से निजात पाने का व अंतिम अशरा में 21,23,25,27,29 मुकदस व पाक राते है। जिन्हे सब कद्र की रात कहा जाता है। इन रातो की इबादत हजार महीनो से बेहतर है। रमजानुल मुबारक के महीने से हर दौलतमन्द लोगो को अपने माल का 2.5 फीसद जकात गरीब मिस्कीन, जरूरतमन्द एवं मदारिस को देना फर्ज है।

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